रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 का संयुक्त मसीही समाज ने कड़ा विरोध जताया है। समाज के प्रतिनिधियों ने इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत बताते हुए इसके खिलाफ मशाल यात्रा निकालने और न्यायालय की शरण लेने की घोषणा की है।
रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेसवार्ता में संयुक्त मसीही समाज के प्रमुख एडवोकेट डेरेश्वर बंजारे और प्रभाकर सोनी ने कहा कि यह विधेयक संविधान की उद्देशिका और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि संविधान विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि यह विधेयक इन अधिकारों को सीमित करने वाला है।
समाज के पदाधिकारियों ने विधेयक में प्रयुक्त “प्रलोभन”, “बल” और “कपटपूर्ण साधन” जैसे शब्दों को अस्पष्ट और भ्रामक बताया। उनका कहना है कि इनकी व्यापक व्याख्या के चलते सामाजिक सेवाओं, दान और धार्मिक गतिविधियों को भी गलत तरीके से धर्मांतरण की श्रेणी में रखा जा सकता है। इससे अनावश्यक मुकदमेबाजी और भेदभाव की आशंका बढ़ेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है, जबकि यह विधेयक इन अधिकारों को प्रभावित करता है। इसके अलावा, अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त समानता, अभिव्यक्ति और जीवन के अधिकारों के उल्लंघन की भी आशंका जताई गई।
समाज के प्रतिनिधियों ने यह भी तर्क दिया कि धर्म से संबंधित विषय संघ सूची के अंतर्गत आता है, ऐसे में राज्य विधानसभा को इस प्रकार का कानून बनाने का अधिकार नहीं है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों—जैसे यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स (UDHR) और इंटरनेशनल कंवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (ICCPR)—के उल्लंघन की बात भी उठाई।
प्रेसवार्ता में यह भी बताया गया कि इसी प्रकार के कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले से याचिकाएं विचाराधीन हैं। ऐसे में नया विधेयक लाना न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत बताया गया।
संयुक्त मसीही समाज ने राज्यपाल से इस विधेयक को मंजूरी न देने की अपील करते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे आंदोलन के साथ-साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।



