करोड़ों के डी.एम.एफ. घोटाले के कारण तात्कालिक सहायक आयुक्त श्रीकांत दुबे निलंबित।
कोरबा डी.एम.एफ. घोटाले में तात्कालिक सहायक आयुक्त माया वारियर पर एफआईआर और गिरफ्तारी।
पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक)
रायपुर/ छत्तीसगढ़ : राज्य के आदिवासी विकास विभाग के गठन के उद्देश्य एवं कार्य की समीक्षा यदि स्वतंत्र रूप से की जाये तो मूल रूप से शासन द्वारा संचालित शासकीय योजनाएं आदिवासी समाज की सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार हेतु सहयोगी है या नहीं ? मानव संसाधन विकास में आदिवासी समाज महत्वपूर्ण योगदान दे पा रहे हैं या नहीं ?
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परंतु आदिवासी समाज में अशिक्षा एवं अज्ञानता इनके जीवन स्तर-सुधर में मुख्य बाधाएं है। कारण विभागीय स्तर पर भारी भष्ट्राचार और अंजाम कौन दे रहे हैं फर्जी तरीके से नियुक्ति पायें बाबू लिलेश्वर देवांगन, दशकों से मलाईदार पद पर कब्जा जमाये पवन कुमार शर्मा, करोड़ों की संपत्तियों के मालिक अरूण दुबे, सुखदेव आदित्य, मनोज तंबोली और मिश्रा जैसे लोग और इनको संरक्षण देते हैं भष्ट्राचार में अंकठ डूबे अधिकारी माया वारियर, श्रीकांत दुबे और संकल्प साहू जैसे अधिकारी ?

विभाग में बाबूओं का भारी दबदबा है और वो विभाग की संचालित योजनाओं के करोड़ों रुपए में फर्जीवाड़ा और गबन घोटाले को बड़ी मात्रा में अंजाम देते है। निर्माण शाखा, भंडार शाखा, कौशल विकास सहित आवश्यक वस्तुओं की खरीदीं जैसे कार्य जिसमें प्रत्येक जिले में करोड़ों रुपए का बजट आवंटित किया जाता है, उसमें आदिवासी समाज के विकास और शिक्षा में सीधे डकैती डाली जाती है।

छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या, जनगणना 2011 के अनुसार 2,55,45,198 है। कुल जनसंख्या में आदिवासी जनसंख्या 78.22 लाख और अनुमानित तौर पर 31प्रतिशत है। वर्तमान में यह 1 करोड़ से अधिक और 40 प्रतिशत संभावित है जनगणना के पश्चात संपूर्ण आंकड़े सार्वजनिक हो जायेंगे। आदिवासी जनसंख्या के आधार पर छत्तीसगढ़ का देश में सातवाँ स्थान है।

छत्तीसगढ़ की साक्षरता दर 70.28 है। जिसमे आदिवासी साक्षरता 50.11 प्रतिशत है। छत्तीसगढ़ का लिंगानुपात 991 है जहां आदिवासी लिंगानुपात 1020 है। इससे ये पता चलता है कि राज्य के आधे आदिवासी निरक्षर हैं और भोले-भाले निरक्षर आदिवासियों को इनके उत्थान के लिए तैनात अधिकारी-कर्मचारी ही हितों में डकैती डाल रहे हैं।

यदि विभागीय भष्ट्राचार की तहों से सिर्फ एक जर्जर पन्ना खोलें तो राजधानी में पदस्थ बाबू लिलेश्वर देवांगन की नियुक्ति 1989-90 में आदिवासी बालक छात्रावास कटगी, तात्कालिक परिक्षेत्र बलौदाबाजार में बतौर अंशकालिक रसोइया के रूप में हुई और मजदूरी दर पर भुगतान प्रारंभ किया गया।

फिर चतुर्थ श्रेणी नैमितिक कर्मचारी उसके बाद नैमितिक लिपिक जिसका शायद आदेश भी विभाग के पास आज उपलब्ध नहीं होगा। क्योंकि तात्कालिक मघ्यप्रदेश सरकार ने 1987 में ही नियुक्तियां प्रतिबंधित कर दी थी।

फिर बाबू लिलेश्वर देवांगन आज दिनांक तक नियमित शासकीय कर्मचारी के रूप में कैसे कार्यरत हैं ?



