खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के छुईखदान क्षेत्र में प्रस्तावित श्री सीमेंट लिमिटेड की चूना पत्थर खदान और सीमेंट फैक्ट्री का विरोध अब एक स्थानीय मुद्दे से कहीं आगे बढ़ चुका है। यह विवाद छत्तीसगढ़ के जल, जंगल, जमीन और विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
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स्थानीय ग्रामीणों, किसानों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि संडी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन से वन भूमि, पहाड़ियां और जल स्रोतों को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। इससे खेत बंजर हो सकते हैं, भूजल स्तर गिर सकता है और क्षेत्र में जल संकट बढ़ सकता है। दिसंबर 2025 में हजारों ग्रामीणों ने 200 से अधिक ट्रैक्टरों के साथ विशाल रैली निकाली, सड़कें जामीं और जनसुनवाई की मांग की। प्रशासन ने भारी विरोध के बाद जनसुनवाई को स्थगित कर दिया, लेकिन ग्रामीण पूरी परियोजना को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं।
यह विरोध छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रों जैसे हसदेव अरण्य, तमनार, बस्तर और अबूझमाड़ में चल रहे आंदोलनों से जुड़ता है। हर जगह मूल मुद्दा एक ही है—क्या औद्योगिक विकास के लिए प्राकृतिक जंगलों को कुर्बान किया जा रहा है?
इस बहस को और गहरा बनाता है अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच (GFW) का डेटा, जो दिखाता है कि छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक या प्राथमिक जंगलों में लगातार ट्री कवर लॉस हो रहा है। ये सदियों पुराने जंगल जैव विविधता, जल संरक्षण और आदिवासी आजीविका के आधार हैं।
दूसरी ओर, सरकारी रिपोर्टें राज्य में कुल फॉरेस्ट और ट्री कवर में वृद्धि दिखाती हैं—जिसमें सड़क किनारे पौधारोपण, कमर्शियल प्लांटेशन और निजी भूमि पर पेड़ शामिल होते हैं। तकनीकी रूप से ये आंकड़े सही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि प्लांटेशन प्राकृतिक जंगलों की जगह नहीं ले सकते। पुराने जंगल एक पूरा इकोसिस्टम हैं—नदियों के स्रोत, वन्यजीवों का निवास और स्थानीय समुदायों की निर्भरता का आधार। इनकी क्षति स्थायी होती है, जबकि कागजी हरियाली अस्थायी भरपाई मात्र है।
खैरागढ़ में उठ रहे सवाल भी इसी बड़े संदर्भ से जुड़े हैं: क्या ग्राम सभाओं की सहमति पारदर्शी थी? क्या पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) निष्पक्ष हुआ? और क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए जल और भूमि का संकट बढ़ेगा?



