Supreme Court New CJI : जस्टिस सूर्यकांत ने आज सोमवार को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में शपथ दिलाई। वह जस्टिस बीआर गवई के स्थान पर इस पद की जिम्मेदारी संभालेंगे, जिनका कार्यकाल रविवार को समाप्त हुआ। जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा और वह 9 फरवरी, 2027 को सेवानिवृत्त होंगे।
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साधारण पृष्ठभूमि से सर्वोच्च न्यायिक पद तक का सफर
10 फरवरी, 1962 को हरियाणा के हिसार जिले में जन्मे जस्टिस सूर्यकांत ने जिला स्तर पर वकालत शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में लंबा समय वकील के रूप में कार्य किया। 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, जिसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
अनुच्छेद 370 और राजद्रोह कानून पर अहम भूमिका
सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए उन्होंने कई ऐतिहासिक संवैधानिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- वह उस संवैधानिक पीठ का हिस्सा थे जिसने जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने के फैसले—अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण—को बरकरार रखा था।
- उन्होंने उस पीठ में भी योगदान दिया जिसने औपनिवेशिक काल के राजद्रोह कानून (धारा 124ए) को प्रभावी रूप से निलंबित कर दिया। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि इस प्रावधान पर पुनर्विचार पूरा होने तक नई FIR दर्ज न हो। यह आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा कदम माना गया।
पेगासस निगरानी मामला: ‘राष्ट्रीय सुरक्षा खुला लाइसेंस नहीं’
पेगासस स्पाइवेयर से कथित निगरानी के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी जस्टिस सूर्यकांत शामिल थे। कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए साइबर विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की थी कि “राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर राज्य को खुला लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।”
लैंगिक न्याय और चुनावी पारदर्शिता पर सख्त रुख
- उन्होंने एक महिला सरपंच को गैरकानूनी ढंग से हटाए जाने के मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया और लैंगिक पूर्वाग्रह पर स्पष्ट टिप्पणी की।
- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और अन्य बार संस्थाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के निर्देश भी उनकी ही पीठ से आए।
- उन्होंने ओआरओपी योजना को संवैधानिक रूप से मान्य ठहराने वाले फैसले में भी योगदान दिया।
- बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के दौरान सूची से हटाए गए 65 लाख मतदाताओं का विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश भी उन्होंने ही दिया था।
अन्य उल्लेखनीय फैसले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2022 की पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा चूक की जांच के लिए न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति नियुक्त करने वाली पीठ का भी वह हिस्सा थे।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े पॉडकास्टर रणवीर इलाहबादिया मामले में उन्होंने टिप्पणी की थी कि “स्वतंत्रता का मतलब सामाजिक मानदंडों को तोड़ने का लाइसेंस नहीं है।”



