बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कांकेर जिले के कुछ गांवों में पादरियों और पास्टरों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बोर्डों के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता को पहले ग्रामसभा या एसडीएम स्तर पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए, और सीधे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना उचित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को निराकृत (खारिज) कर दिया।
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गांवों में लगे थे ‘धर्म प्रचारकों के प्रवेश निषेध’ बोर्ड
यह मामला भानुप्रतापपुर ब्लॉक के ग्राम घोटिया और आसपास के गांवों से जुड़ा है, जहां हाल के महीनों में ग्रामीणों ने गांव के प्रवेश द्वारों पर ‘ईसाई पादरियों और धर्म प्रचारकों का प्रवेश वर्जित है’ जैसे बोर्ड लगा दिए थे। ग्रामीणों का कहना था कि गांव में जबरन धर्मांतरण की कोशिशें हो रही हैं, वहीं ईसाई संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए कोर्ट से दखल देने की अपील की थी।
राज्य सरकार की दलील पर सहमत हुई अदालत
राज्य शासन की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं ने बिना स्थानीय प्रशासन को शिकायत किए सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी, जबकि इस तरह के मामलों में पहले स्थानीय स्तर पर निपटारा जरूरी होता है। अदालत ने शासन की इस दलील से सहमति जताते हुए कहा ऐसे मामलों में प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित न हो।”



