बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन रीडर-क्लर्क बाबूराम पटेल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी ने रिश्वत मांगी थी या उसे अवैध लाभ के रूप में स्वीकार किया था। यह निर्णय जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने सुनाया।
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मामला वर्ष 2002 का है। लोकायुक्त कार्यालय बिलासपुर में मथुरा प्रसाद यादव नामक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के लिए ₹5,000 की रिश्वत मांगी थी, जो बाद में ₹2,000 में तय हुई। शिकायत के आधार पर लोकायुक्त टीम ने ट्रैप कार्रवाई की।
शिकायतकर्ता को 100-100 रुपये के 15 नोट (कुल ₹1,500) दिए गए थे, जिन पर फिनाल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था। आरोप था कि आरोपी ने यह रकम स्वीकार की और मौके पर रंगे हाथ पकड़ा गया। जांच के बाद आरोपी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(डी) सहपठित 13(2) के तहत मामला दर्ज हुआ।
ट्रायल कोर्ट का फैसला:
30 अक्टूबर 2004 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश, बिलासपुर ने आरोपी को एक-एक वर्ष के कठोर कारावास और ₹500-₹500 के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अपील में बचाव पक्ष का तर्क:
बाबूराम पटेल ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष के अधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहा कि आरोपी को झूठे प्रकरण में फंसाया गया। शिकायतकर्ता की पत्नी पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ चल रही एक जांच में आरोपी शामिल था, जिससे निजी द्वेष के चलते साजिश रची गई।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता द्वारा दी गई ₹1,500 की रकम रिश्वत नहीं थी, बल्कि ग्रामवासियों से पट्टा शुल्क के रूप में ली गई बकाया राशि थी। इसके अलावा, कुल ₹3,180 की जब्ती राशि में से ₹1,500 को रिश्वत मानना भी संदिग्ध था।
अभियोजन पक्ष का पक्ष:
राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि ट्रैप सफल रहा था और आरोपी ने रिश्वत के पैसे स्वीकार किए थे।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय:
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों — बी. जयाराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश (2014) और सौंदर्या राजन बनाम स्टेट (2023) — का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ नोटों की बरामदगी से रिश्वत का अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक कि मांग और स्वीकार का ठोस सबूत न हो।
अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता खुद यह स्पष्ट नहीं कर सका कि दी गई रकम रिश्वत थी या पट्टा शुल्क की राशि। उसने स्वीकार किया कि शिकायत लोकायुक्त एसपी के कहने पर दर्ज की गई थी और उसे पूरी तरह पढ़ा भी नहीं गया था। रिकॉर्ड किए गए वार्तालाप में आरोपी की आवाज भी साफ़ नहीं थी।
ट्रैप टीम के तीन सदस्यों के बयान भी परस्पर विरोधाभासी थे — किसी ने पैसे दाएं जेब से, किसी ने बाएं, तो किसी ने पीछे की जेब से बरामद होने की बात कही। अदालत ने कहा कि मांग, स्वीकारोक्ति और बरामदगी – तीनों ही बिंदु संदिग्ध और असंगत हैं, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
न्यायालय ने निष्कर्ष दिया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका, और ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर 2004 का निर्णय रद्द करते हुए बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।



