पंकज विश्वकर्मा(समाचार संपादक)
रायपुर : श्री रामचंद्र स्वामी जैतूसाव मठ की सेजबहार स्थित 92 एकड़ की बेशकीमती जमीन का एक और बड़ा विवाद फिर सामने आया है। इस 92 एकड़ जमीन में से 29 एकड़ जमीन को कांग्रेस के तात्कालिक बाहुबली नेता राजेंद्र तिवारी को वर्ष 2000 में विक्रय कर दिया गया था। इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए मंहत राम आशीष दास ने शासन से इस पूरे फर्जीवाड़े और दस्तावेजों में की गई कूटरचना की जांच को एक उच्च स्तरीय समिति से कराने की मांग की है।

शासन ने हिंदू धर्मावलंबी की आस्था के इस बड़े केंद्र के पूरे मामले और फर्जीवाड़ों को बड़ी गंभीरता से लिया भी है। रायपुर संभाग आयुक्त महादेव कांवरे ने तत्काल प्रभावी कदम उठाते हुए इस पूरे मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन रायपुर संभाग उपायुक्त बी.आर.जोशी की अध्यक्षता में किया है। इस उच्च स्तरीय जांच के लिए उपायुक्त रायपुर संभाग के साथ 4 सदस्यों की गठित टीम को कड़े निर्देश भी दिए गए है। इस हाई पावर कमेटी को सख्त निर्देश देते हुए आयुक्त महादेव कांवरे ने आदेश दिया है कि प्रकरण की जांच कर 15 दिनों में अनिवार्य रूप से जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।
दरअसल ये बड़ा मामला मंहत राम आशीष दास के आवेदन और जांच की मांग से खुला है। मंहत राम आशीष द्वारा शासन को प्रस्तुत दस्तावेजों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि किस तरह तात्कालिक मघ्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना सहित निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए किये गये फर्जीवाड़ा और दस्तावेजों में कूटरचना को किया गया है। वर्ष 1983 को पंजीयक सार्वजनिक न्यास के समक्ष प्रस्तुत कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर मठ की सेजबहार स्थित 92 एकड़ जमीन की बिक्री के लिए अनुमति प्राप्त की जाती है। इस अनुमति के विरुद्ध बांके बिहारी अग्रवाल मघ्यप्रदेश उच्च न्यायालय में वाद दायर कर भूमि विक्रय पर स्थगन आदेश प्राप्त करते है। माननीय विद्वान न्यायाधीश ने अपने फैसले में दिनांक 18 अप्रैल 1984 को इस जमीन के विक्रय- नामांतरण पर रोक लगा देते हैं।

उसके बाद 18 अक्टूबर 1984 को एक अपंजीकृत वसीयतनामा स्व. महंत राम भूषण दास के नाम पर बनाया जाता है और इस वसीयतनामा में स्वयंभू ट्रस्टी अजय तिवारी बतौर गवाह हस्ताक्षर करते हैं। इस वसीयतनामा में 92 एकड़ जमीन में से कौन-कौन से खसरे की 29 एकड़ जमीन वसीयत की गई है उसका उल्लेख नहीं किया गया था। इस वसीयतनामा के आधार पर राजस्व अधिकारियों-कर्मचारियों की मिली भगत से सेजबहार स्थित 92 एकड़ में खसरा नं 19 की बेशकीमती 29 एकड़ जमीन का नामांतरण किया जाता है और वर्ष 2000 में इस को कांग्रेस नेता राजेंद्र तिवारी को विक्रय कर दिया जाता है।
महंत राम आशीष दास ने स्पष्ट रूप से शासन को बताया है कि अप्रैल 1984 में माननीय मघ्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने स्थगन आदेश के माध्यम से इस 92 एकड़ जमीन के विक्रय – नामांतरण पर जब रोक लगाई थी तो अक्टूबर 1984 को ये फर्जी वसीयतनामा कैसे बन गया जिस पर स्वयंभू ट्रस्टी अजय तिवारी ने हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने यह भी लिखा है कि यदि महेंद्र अग्रवाल 1984 से इस ट्रस्ट के सचिव है तो इस पूरे फर्जीवाड़े को किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत क्यों नहीं किया। मतलब साफ है कि वो भी इस फर्जीवाड़ों और कूटरचना में शामिल हैं। और जब इस वसीयतनामा के आधार पर वर्ष 2000 में 29 एकड़ जमीन कांग्रेस नेता राजेंद्र तिवारी को बेच दी गई तो क्यों कोई कड़ा कानूनी कदम नहीं उठाया गया।
इस पूरे मामले के खुलने से कांग्रेस नेता राजेंद्र तिवारी, मठ के स्वयंभू सचिव महेंद्र अग्रवाल और स्वयंभू ट्रस्टी अजय तिवारी की मुश्किलें बढ़ जायेगी क्योंकि इस मामले में शासन ने सख्त कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है।
रायपुर न्यूज नेटवर्क और RNN24 की पड़ताल में और भी बड़े पैमाने पर कूटरचना और मठ की जमीनों की बिक्री के कई घोटाले सामने आयें है। बहुत जल्द हम इन सब को उजागर करेंगे।



