पंकज विश्वकर्मा(समाचार संपादक)
रायपुर। सैकड़ों वर्षों पूर्व सनातन धर्मावलंबियों द्वारा रायपुर में श्री ठाकुर रामचन्द्र स्वामी जैतूसाव मंदिर और मठ की स्थापना की गई थी। स्थापना का मुख्य उद्देश्य हिन्दू धर्म की रक्षा और प्रचार-प्रसार के साथ साधु-संतों, दीन-दुखियों की सेवा के साथ धर्मार्थ परोपकारी कार्य थे। मंदिर और मठ के पास सैकड़ों एकड़ जमीन,बाड़ा, बावली, कुएं, भूखंड सहित कई चल-अचल संपत्ति थी जिसे हिन्दू धर्मावलंबीओ ने दान में दी थी।

भारत की आजादी और तात्कालिक मध्यप्रदेश के गठन के बाद तात्कालिक मंहत,दानदाताओं और तात्कालिक गणमान्यजन द्वारा सृजनकर्ता के रूप में 1955 में एक सार्वजनिक न्यास और ट्रस्ट का गठन कर इसका पंजीयन कर कानूनी रूप से मठ-मंदिरों की चल-अचल संपत्ति को सुरक्षित करना सुनिश्चित किया। पंरतु मंहत लक्ष्मीनारायण दास और उनके शिष्य मंहत रामभूषण दास की मृत्यु के बाद भ्रष्ट राजनेताओं, उनके दलाल और भूमाफियाओं की नजर मठ-मंदिरों की चल-अचल संपत्ति पर गड़ गई और उन्होंने इस पर क़ब्ज़े और अफरातफरी की तैयारी साथ फर्जीवाड़ों की शुरुआत कर दी।

वर्ष 1972 में ठाकुर रामचन्द्र जी स्वामी जैतूसाव मठ, रायपुर द्वारा मंहत लक्ष्मीनारायण दास ने तात्कालिक कलेक्टर से अनुमति प्राप्त कर विश्वनाथ पांडेय को बेच दी। जिसे 1986 में उनके वारिसान ने फौती नामांतरण कराया। पंरतु नामांतरण के बाद खसरा-खतौनी, पांचसाला एवं राजस्व अभिलेखों में दुरुस्त नहीं होने से विक्रेता का नाम ही चला आ रहा था। इस बात से अनभिज्ञ इस गिरोह ने 1983 में इसी जमीन को बेचने का इकरारनामा कर लालाराम वर्मा और कुछ अन्य किसानों से कर लिया।

अब इस जमीन में तीन पक्षकार बन गए और पूरा प्रकरण राजस्व न्यायालयों में आ गया। विश्वनाथ पांडेय के वारिस के रूप में उमा तिवारी ने अपना दावा प्रस्तुत किया और दस्तावेज प्रस्तुत किया। जिस पर ट्रस्ट और लालाराम वर्मा ने विरोध किया। राजस्व न्यायालयों तात्कालिक तहसीलदार और तात्कालिक अनुविभागीय अधिकारी ने वर्ष 2020 में उमा तिवारी के पक्ष में फैसला दिया। इस हार से ट्रस्ट ने अपने आप को इससे अलग कर लिया।

पंरतु इसके बाद लालाराम वर्मा ने आयुक्त रायपुर संभाग और राजस्व मंडल में उमा तिवारी और मंदिर ट्रस्ट दोनों के विरुद्ध केस दर्ज कराया। इस पूरे मामले में भी आयुक्त, रायपुर संभाग और अध्यक्ष, राजस्व मंडल ने वर्ष 2022 में उमा तिवारी के पक्ष में फैसला दिया। जिस पर लालाराम वर्मा सिविल कोर्ट में मामले को लेकर गए जो आज भी वहां लंबित है।

अब इसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न्यास के सृजनकर्ताओं और दानदाताओं ने सहित कई लोगों ने न्यास की चल-अचल संपत्ति के दुरूपयोग और अफरातफरी को देखते हुए पंजीयक सार्वजनिक न्यास को आवेदन दिया और इसे रोकने की गुहार लगाई। जिस पर तात्कालिक पंजीयक, सार्वजनिक न्यास ने 2007 में ही लोक न्यास अधिनियम 1951 की धारा 26 के अंतर्गत जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर को न्यास समिति को भंग कर उसके स्थान पर पर रिसीव्हर नियुक्त करने के लिए प्रस्तुत कर दिया।

इसके बाद इस लड़ाई को जारी रखते हुए मंहत आशीष दास ने मामले को आगे बढ़ाया। वर्ष 2016 में पूर्व आईएएस अधिकारी और तात्कालिक अध्यक्ष, राजस्व मंडल ने अपने आदेश में कहा कि जनहित में मठ की चल-अचल संपत्ति की व्यवस्था और उसके दुरुपयोग को रोकने भंग न्यास समिति की जगह प्रबंधक के रूप में कलेक्टर को दर्ज़ किया जाना चाहिए। क्रमशः
भारत माला प्रोजेक्ट घोटालों पर इनसाइड स्टोरी और एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट – 2(संपूर्ण दस्तावेज़ी साक्ष्यों, साक्षात्कार और ग्राउंड रिपोर्ट पर आधारित)



