पंकज विश्वकर्मा(समाचार संपादक)
रायपुर : आज निःशब्द हूं एक पत्रकार की मौत से। पत्रकार समय बंधक होता है क्योंकि हर समाचार के लिए समय बंधन तय है। क्या खोजी पत्रकारिता का अंत मौत है? मैं भी इसी राह का पथिक हूं। लम्बा अरसा हो गया है मुझे तो डर नहीं लगता पंरतु “मालती” डर के साये में हमेशा जीवन गुज़ारती है, डर भी जायज़ है क्योंकि कुछ बच्चों को हमने गोद लिया है। उनकी जिम्मेदारी हमारी है सिर्फ मेरी या सिर्फ उसकी नहीं। हम दोनों की बराबर है।

लालन-पालन उसके और आर्थिक मेरे। कभी कभी मैं कमजोर और सही नहीं हो सकता हूं पर उसने अपने कर्तव्य में कहीं कोई कोताही नहीं बरती। सबसे पहले इस घटनाक्रम की जानकारी मालती ने दी, पत्नी धर्म के साथ वो पत्रकारिता में भी वो मेरी हमकदम है। कुछ दिन पूर्व उसने मुकेश के एक कोट को मुझे भेजा था ” सीधे मौत की सजा देते हो, वजह क्या है? मुझे बताओ तो सही, मेरा गुनाह क्या है?”

पता चला पुलिस ने सेप्टिक टैंक में लाश बरामद की है। कुल मिलाकर तय हो गया एक खोजी पत्रकार का अंत हो गया जिसने कुछ समय पूर्व एक 45 किलोमीटर की सड़क में भष्ट्राचार का एक बड़ा मामला उजागर किया था।
बस्तर आज दो मामलों में राज्य के साथ पूरे देश में आकर्षण का विषय है एक कवासी लखमा और उनके पुत्र की ई.डी में पूछताछ और पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या। दोनों ही मामले भष्ट्राचार से जुड़े हैं। भविष्य के गर्भ में बहुत कुछ छिपा है किसी की मौत या ?



