पंकज विश्वकर्मा ( समाचार संपादक )
जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ मृत्यु है, पंरतु हम सब इसको भूल कर मगन रहते हैं एक कभी ना खत्म होने वाली दौड़ में,या डर कर भूलने का प्रयास करते हैं जीवन के सर्वोच्च सत्य को। आज राजधानी के रायपुर प्रेस क्लब में कार्यरत लता बाई गिरपूंजे नहीं रही। सालों से आदत थी उनकी आज अचानक खबर आई की लता बाई नहीं रही।
सबसे समान रूप से प्रेम,आदर और वात्सल्य ये गुण लम्बे समय तक उनकी यादों को कई पत्रकारों के हृदय में संजोए रखेगा। मेरे जैसे कई बड़े पत्रकारो को अपनी मीठी सी झिड़की से सुधार देती थी। मां के जैसा ममत्व था। अक्सर बारिश में रेनकोट नहीं पहनें से लेकर चाय के कप को कहीं भी रख देने पर तुरंत वो उलाहना बरबस आज की बारिश में बहुत याद आ रही है।
अक्सर अनिल भैय्या के साथ कैरम की हार पर उनका यह कहना कि तुम लोग लता बाई के साथ पहले प्रैक्टिस किया करों फिर आया करों खेलने। अब बहुत खलेगा। वरिष्ठ हो या नये नवेले पत्रकार सभी के मन में उनके के लिए बेहद सम्मान था। मैं तो हमेशा उन्हें माताराम ही संबोधित किया करता था, मेरे इस संबोधन पर मेरे कई कनिष्ठ भी उन्हें ये संबोधित करते रहे।
मुझ जैसे कई और वरिष्ठ पत्रकारों को उनकी गलती पर आंखों से ही एहसास करा देना उनकी बड़ी खूबी थी। सभी किसी भी अपशब्द के प्रयोग से पहले देख लेते थे कहीं लता बाई तो आसपास नहीं है। सालों से उनकी आदत थी। उनकी कमी शायद ही कोई भर सकें। अक्सर क्लब में आने वाले उनके स्वास्थ्य का हालचाल लेते रहते थे। खैर ईश्वर की मर्जी के आगे मनुष्य बेबस होता है। मनुष्य के जीवन में मृत्यु ही सर्वोच्च सत्य है आज माताराम लता बाई ने अपने सर्वोच्च सत्य को पा लिया।



